स्वदेसी दिवाली

 भारत एक ऐसा देश है जहां पर घर पर समान पहुंचाने की सुविधा अनादि काल से है और समय और त्योहारों के साथ अलग अलग व्यक्ति अलग अलग समान जरूरत के अनुसार पहुंचाते रहते है।आज दिवाली का त्यौहार है और कुम्हारी गांव में सभी के घरों में दीए पहुंचा चुकी है। पुराने समय में सभी व्यक्ति घी के दीए एवं मिठाइयों के साथ ही दिवाली मनाते थे लेकिन आज माहौल थोड़ा बदलता जा रहा है मनुष्य पर सभ्यता के आवरण इस तरह से चढ़ गए हैं कि वह केवल दीयों के साथ दिवाली बनाने में खुद को गरीब एवं तुच्छ समझता है जो की बहुत बड़ी समस्या है आज मनुष्य खुद को भूलता जा रहा है और शहरों में तो लोग बिल्कुल डूब ही चुके है आज मनुष्य दियों के साथ लड़ी, मोमबत्ती, मॉम के दिए, पटाखे और अन्य दिखावटी समान को साथ में जोड़ लिया है जो कि फिजूल खर्च है और सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य ऐसा करना नहीं चाहता है बस उसके दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि इसी से हम सभ्य दिखते हैं और मनुष्य जितना सभ्य दिखने के आवरण चढ़ाएगा खुशियों से उतना ही दूर होता चला जाएगा इसलिए हमारी खुशियों को बचाने के लिए क्यों न हम मिलकर इन आवरणों को तोड़ दे और साधारण मनुष्य का जीवन यापन करें और खुश रहे। मेरी सभी से यही विनती है कि इस दिवाली सभी स्वदेशी वस्तुओ के साथ दिवाली बनाएं। अपनो के साथ अपनी वस्तुओं के साथ दिवाली मनाएं इसी के साथ दिवाली की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।दीपो के इस त्यौहार में समाज में सभी स्वस्थ रहे खुश रहे यही मेरी मंगलकामना हैं।

                                                     साहिल भारद्वाज

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